Physiology: Ayurveda General Knowledge Questionnaire-2

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Physiology: Ayurveda General Knowledge Questionnaire-2
शरीरक्रियाविज्ञान: आयुर्वेद सामान्य ज्ञान प्रश्नावली-2

(101) आचार्य वाग्भट्ट के अनुसार ‘बोधक कफ’ का स्थान क्या है ?

(क) आमाषय (ख) रसना (ग) कण्ठ (घ) जिहृवामूल, कण्ठ
(102) चरकानुसार प्राकृत शरारस्थ वायु का कर्म नहीं है।

(क) तन्त्रयंत्रधर (ख) सर्वेन्द्रियाणामुद्योजक (ग) समीरणोऽग्नेः (घ) सर्वशरीरव्यूहकर
(103) मन का नियंत्रण कौन करता है।

(क) मस्तिष्क (ख) मन (ग) वायु (घ) आत्मा
(104) वायुस्तन्त्रयन्त्रधर – में ‘तंत्र’ का क्या अर्थ है।

(क) मस्तिष्क (ख) शरीर (ग) शरीरवयव (घ) आत्मा
(105) आयुषोऽनुवृत्ति प्रत्ययभूतो – किसका कर्म है।

(क) वायु का (ख) मन का (ग) आत्मा का (घ) मस्तिष्क का
(106) ‘वातलाद्याः सदातुराः’ – किसका कथन है।

(क) चरक (ख) सुश्रुत (ग) वाग्भट्ट (घ) काष्यप
(107) ‘वातिकाद्याः सदाऽऽतुराः’ – किसका कथन है।

(क) चरक (ख) सुश्रुत (ग) वाग्भट्ट (घ) काष्यप
(108) ‘सर्वा हि चेष्टा वातेन स प्राणः प्राणिनां स्मृतः। ’- सूत्र चरक संहिता के किस अध्याय में वर्णित है।

(क) वातकलाकलीय (ख) वातव्याधिचिकित्सा (ग) दीर्घजीवतीय (घ) कियन्तःशिरसीय
(109) मन का निग्रह किसके द्वारा होता है।

(क) मस्तिष्क (ख) आत्मा (ग) वायु (घ) स्वयं मन
(110) ‘वाताद् ऋते नास्ति रूजा’ – किस आचार्य का कथन है।

(क) चरक (ख) सुश्रुत (ग) वाग्भट्ट (घ) शारंर्ग्धर
(111) ‘पित्तं पड्गु कफः पड्गुः पड्वो मलधातवः। वायुना यत्र नीयन्ते तत्र गच्छन्ति मेघवत।’- किसका कथन है।

(क) चरक (ख) सुश्रुत (ग) वाग्भट्ट (घ) शारंर्ग्धर
(112) कामशोक भयद्वायुः क्रोधात् पित्तम् लोभात् कफम्। – किस आचार्य ने कहा है।

(क) चरक (ख) सुश्रुत (ग) काष्यप (घ) माधव
(113) वैदिक ग्रंथोक्त पांच वायु में से कूमल वायु का कार्य होता है ।

(क) उदगार (ख) उन्मेष (ग) जृम्भा (घ) क्षुधा
(114) वैदिक ग्रंथोक्त पांच वायु में से कौनसी वायु सर्वव्यापी है और मरणोपरान्त भी रहती है।

(क) नाग (ख) कूर्म (ग) देवदत्त (घ) धनंजय
(115) सुश्रुतानुसार ‘उद्वहन’ कौनसी वायु का कार्य है ?

(क) प्राण वायु (ख) उदान वायु (ग) समान वायु (घ) व्यान वायु
(116) सुश्रुतानुसार ‘पूरण’ कौनसी वायु का कार्य है ?

(क) प्राण वायु (ख) तर्पक कफ (ग) मज्जा धातु (घ) उपरोक्त सभी
(117) त्रिउपस्तम्भ है ?

(क) वात, पित्त, कफ (ख) आहार, निद्रा, ब्रह्मचर्य (ग) सत्व, आत्मा, शरीर (घ) हेतु, दोष, द्रव्य
(118) ‘आहार, स्वप्न तथा ब्रह्मचर्य’ – किस आचार्य के अनुसार त्रय उपस्तम्भ हैं।

(क) चरकानुसार (ख) अष्टांग संग्रहानुसार (ग) सुश्रुतानुसार (घ) अष्टांग हृदयानुसार
(119) वाग्भट्टानुसार त्रिउपस्तम्भ है।

(क) वात, पित्त, कफ (ख) आहार, निद्रा, अब्रह्मचर्य (ग) आहार, निद्रा, ब्रह्मचर्य (घ) सत्व, आत्मा, शरीर
(120) त्रिस्तम्भ है।

(क) वात, पित्त, कफ (ख) आहार, निद्रा, ब्रह्मचर्य (ग) सत्व, आत्मा, इन्द्रिय (घ) हेतु, दोष, द्रव्य
(121) स्कन्धत्रय है।

(क) वात, पित्त, कफ (ख) आहार, निद्रा, ब्रह्मचर्य (ग) सत्व, आत्मा, इन्द्रिय (घ) हेतु, दोष, द्रव्य
(122) त्रिस्थूण है।

(क) हेतु, लिंग, औषध (ख) आहार, निद्रा, ब्रह्मचर्य (ग) वात, पित्त, कफ (घ) सत्व, रज, तम
(123) शरीरधारणात् धातव इत्युच्यन्ते। – किस आचार्य का कथन है।

(क) चरक (ख) चक्रपाणि (ग) सुश्रुत (घ) डल्हण
(124) रस धातु के 2 भेद – (1) स्थायी रस और (2) पोषक रस – किस आचार्य ने बतलाए है।

(क) चरक (ख) चक्रपाणि (ग) सुश्रुत (घ) डल्हण
(125) आर्तव को अष्टम धातु किस आचार्य ने माना है।

(क) भावप्रकाष (ख) चक्रपाणि (ग) काष्यप (घ) शारंर्ग्धर
(126) ओज को अष्टम धातु किस आचार्य ने माना है।

(क) भावप्रकाष (ख) चक्रपाणि (ग) काष्यप (घ) शारंर्ग्धर
(127) रक्त को चतुर्थ दोष किसने माना है।

(क) चक्रपाणि (ख) सुश्रुत (ग) अष्टांग संग्रह (घ) ब, स दोनों
(128) चरक मतानुसार रक्त का होता है ?

(क) 9 अंजलि (ख) 8 अंजलि (ग) 4 अंजलि (घ) 5 अंजलि
(129) मेद का अंजलि प्रमाण होता है।

(क) 5 (ख) 4 (ग) 2 (घ) 3
(130) ‘जीवन’ किसका कर्म है।

(क) रस धातु (ख) रक्त धातु (ग) स्तन्य (घ) ब और स दोनों
(131) ‘प्रीति’ किस धातु का कर्म है।

(क) रस धातु (ख) मज्जा धातु (ग) शुक्र धातु (घ) ब और स दोनों
(132) ‘शरीरपुष्टि’ किस धातु का कर्म है।

(क) रस धातु (ख) मांस धातु (ग) शुक्र धातु (घ) ओज
(133) ’दृढत्वम्’ किस धातु का कार्य है ?

(क) अस्थि धातु (ख) मांस धातु (ग) मज्जा धातु (घ) मेद धातु
(134) भावप्रकाष के अनुसार ’रक्त’ धातु की पंचभौतिकता में शामिल है ?

(क) अग्नि (ख) अग्नि + जल (ग) अग्नि + पृथ्वी (घ) पंचमहाभूत
(135) डल्हण के अनुसार ’अस्थि’ धातु की पंचभौतिकता है ?

(क) पृथ्वी + वायु + आकाश (ख) पृथ्वी + वायु (ग) अग्नि + पृथ्वी (घ) पृथ्वी + आकाष
(136) ‘अहरहर्गच्छति इति’ किस धातु की निरूक्ति है।

(क) रस धातु (ख) रक्त धातु (ग) मांस धातु (घ) शुक्र धातु
(137) तर्पयति, वर्द्धयति, धारयति, यापयति किसके कर्म है।

(क) रस धातु (ख) रक्त धातु (ग) ओज (घ) वात
(138) रस धातु के 2 भेद – (1) स्थायी रस, (2) पोषक रस – किस आचार्य ने बतलाए है।

(क) चरक (ख) चक्रपाणि (ग) सुश्रुत (घ) डल्हण
(139) ‘शब्दार्चिजलसंतानवद्’ से किस धातु का ग्रहण किया जाता है।

(क) रस (ख) रक्त (ग) मज्जा (घ) शुक्र
(140) सुश्रुतानुसार ‘स्थौल्य और कार्श्य’ विशेषतः किस पर निर्भर है।

(क) रस (ख) रक्त (ग) स्वप्न और आहार (घ) मांस धातु
(141) सुश्रुतानुसार रस धातु का रंजन कहॉ पर होता है।

(क) हृदय (ख) आमाषय (ग) यकृत प्लीहा (घ) इनमें से कोई नहीं
(142) सुश्रुतानुसार रक्त धातु ही एक मात्र धातु है जो पाच्चमहाभौतिक होती है उस रक्त धातु में ‘लघुता’ कौनसे महाभूत का गुण होता है।

(क) जल (ख) अग्नि (ग) वायु (घ) आकाश
(143) रक्त की परिभाषा किस आचार्य ने बतलायी है।

(क) चरक (ख) सुश्रुत (ग) हारीत (घ) माधव
(144) प्राणियों के प्राण किसका अनुवर्तन करते है।

(क) शोणित (ख) ओज (ग) आहार (घ) वायु
(145) तपनीयेन्द्रगोपाभं पùालक्तक सन्निभम्। गुन्जाफल सवर्ण च – किसके लिए कहा गया है।

(क) विषुद्ध शोणित (ख) विषुद्ध आर्तव (ग) दोनों (घ) इनमें से कोई नहीं
(146) रक्तज रोगों का निदान किससे होता है।

(क) उपषय (ख) अनुपशय (ग) रूप (घ) पूर्वरूप
(147) देहस्य रूधिरं मूलं रूधिरेणैव धार्यते – किस आचार्य का कथान है।

(क) चरक (ख) सुश्रुत (ग) वाग्भट्ट (घ) शांरर्ग्धर
(148) सुश्रुतानुसार धातुओ की क्षीणता और वृद्धि में मूल कारण क्या है।

(क) रस धातु (ख) रक्त धातु (ग) ओज (घ) आहार
(149) ‘मेद पुष्टि’ कौनसी धातु का कार्य है।

(क) रस धातु (ख) रक्त धातु (ग) मांस धातु (घ) मेद धातु
(150) छोटी अस्थियों के मध्य में विषेष रूप से क्या होती है।

(क) मज्जा (ख) रक्त (ग) मेद (घ) सरक्त मेद
(151) ‘देहधारण’ कौनसी धातु का कार्य है।

(क) अस्थि धातु (ख) रक्त धातु (ग) मांस धातु (घ) मेद धातु
(152) स्थूलास्थियों के मध्य में विषेष रूप से क्या होती है।

(क) मज्जा (ख) रक्त (ग) मेद (घ) सरक्त मेद
(153) ‘विलीनघृताकारो’ किसके लिए कहा गया है।

(क) अस्थिगत मज्जा (ख) मस्तिष्क मज्जा (ग) दोनों (घ) इनमें से कोई नहीं
(154) आहार का परम धाम होता है।

(क) शुक्र (ख) ओज (ग) रसधातु (घ) रक्त
(155) शुक्र का वर्ण ’घृतमाक्षिकं तैलाभ’ सम किसने माना है।

(क) चरक (ख) सुश्रुत (ग) वाग्भट्ट (घ) चक्रपाणि
(156) ‘चरतो विष्वरूपस्य रूपद्रव्यं’ – किसके लिए कहा गया है।

(क) शुक्र (ख) ओज (ग) आत्मा (घ) रक्त
(157) रस धातुप्रदोषज विकारों की चिकित्सा है।

(क) लंघन (ख) लंघन पाचन (ग) दोषावसेचन (घ) उपर्युक्त सभी
(158) ‘रक्तपित्तहरी क्रिया’ – किन रोगों में करनी चाहिए ?

(क) पित्तज रोग (ख) रक्तजरोग (ग) संतर्पणजरोग (घ) रक्तपित्त
(159) ‘पंचकर्माणि भेषजम्’ किस धातुप्रदोष्ाज विकार की चिकित्सा में निर्देषित है।

(क) मांस (ख) मेद (ग) अस्थि (घ) मज्जा
(160) ‘व्यवाय, व्यायाम, यथाकाल संशोधन’ – किस धातुप्रदोषज विकार की चिकित्सा में निर्देषित है।

(क) अस्थि (ख) मज्जा (ग) शु्क्र प्रदोषज (घ) मज्जा एवं शु्क्र प्रदोषज
(161) ‘संशोधन, शस्त्र, अग्नि, क्षारकर्म’ – किस धातुप्रदोषज विकार की चिकित्सा में निर्देषित हैं।

(क) मांस प्रदोषज (ख) मेद प्रदोषज (ग) अस्थि प्रदोषज (घ) उपधातु प्रदोषज
(162) ‘एककाल धातु पोषण न्याय’ के प्रवर्तक है।

(क) अरूणदत्त (ख) सुश्रुत (ग) दृढबल (घ) भावप्रकाष
(163) ‘केदारीकुल्या न्याय’ के प्रवर्तक है।

(क) अरूणदत्त (ख) सुश्रुत (ग) दृढबल (घ) भावप्रकाष
(164) ‘क्षीर दधि न्याय’ के प्रवर्तक है।

(क) अरूणदत्त (ख) सुश्रुत (ग) दृढबल (घ) भावप्रकाष
(165) ‘खले कपोत न्याय’ के प्रवर्तक है।

(क) अरूणदत्त (ख) सुश्रुत (ग) दृढबल (घ) भावप्रकाष
(166) आचार्य चरक कौनसे न्याय के समर्थक है।

(क) एककाल धातु पोषण न्याय (ख) केदारीकुल्या न्याय (ग) क्षीर दधि न्याय (घ) खले कपोत न्याय
(167) आचार्य सुश्रुत कौनसे न्याय के समर्थक है।

(क) एककाल धातु पोषण न्याय (ख) केदारीकुल्या न्याय (ग) खले कपोत न्याय (घ) ब, स दोनों
(168) आचार्य वाग्भट्ट कौनसे न्याय के समर्थक है।

(क) एककाल धातु पोषण न्याय (ख) केदारीकुल्या न्याय (ग) क्षीर दधि न्याय (घ) खले कपोत न्याय
(169) आचार्य भावप्रकाष कौनसे न्याय के समर्थक है।

(क) एककाल धातु पोषण न्याय (ख) केदारीकुल्या न्याय (ग) क्षीर दधि न्याय (घ) खले कपोत न्याय
(170) ‘अशांश परिणाम पक्ष’ कहलाता है।

(क) क्षीर दधि न्याय (ख) केदारीकुल्या न्याय (ग) खले कपोत न्याय (घ) एककाल धातु पोषण
(171) सुश्रुतानुसार रस से आर्तव के निमार्ण कितना समय लगता है ?

(क) 1 मास (ख) 1 सप्ताह (ग) 6 अहोरात्र (घ) 15 अहोरात्र
(172) चरकानुसार रस से शुक्र निमार्ण कितना समय लगता है ?

(क) 1 मास (ख) 1 सप्ताह (ग) 6 अहोरात्र (घ) 15 अहोरात्र
(173) सुश्रुतानुसार रस से शुक्र धातु के निर्माण कितना समय लगता है।

(क) 3015 कला (ख) 18090 कला (ग) 30015 कला (घ) 1890 कला
(174) ‘गतिविवर्जिताः’ किसके संदर्भ में कहा गया है ?

(क) धातु (ख) उपधातु (ग) ओज (घ) मल
(175) शारंर्ग्धर के अनुसार ‘केष, रोम’ किसकी उपधातु है ?

(क) अस्थि (ख) मज्जा (ग) मेद (घ) शुक्र
(176) ‘स्नायु व वसा’ यह क्रमषः किस धातु की उपधातुएॅं हैं ?

(क) मांस, मज्जा (ख) मेद, मज्जा (ग) मांस, मेद (घ) मेद, मांस
(177) डल्हण के अनुसार ‘संधि’ किसकी उपधातु है ?

(क) अस्थि (ख) मज्जा (ग) मेद (घ) शुक्र
(178) ‘दोषधातुवहाः’ किसके लिए कहा गया है ?

(क) सिरा (ख) धमनी (ग) स्रोत्रस् (घ) कला
(179) वाग्भट्ट के अनुसार त्वचा का निमार्ण कौनसी धातु से होता है ?

(क) रस (ख) रक्त (ग) मांस (घ) मेद
(180) कौनसी संहिता में ‘उपधातु’ का वर्णन नहीं किया गया है ?

(क) चरक (ख) सुश्रुत (ग) वाग्भट्ट (घ) शारंर्ग्धर
(181) प्रथमं जायते ह्योजः शरीरेऽस्मन् शरीरिणाम्। – किस आचार्य का कथन है।

(क) चरक (ख) सुश्रुत (ग) काष्यप (घ) वाग्भट्ट
(182) ओज को ‘बल’ संज्ञा किस आचार्य ने दी है।

(क) चरक (ख) सुश्रुत (ग) काष्यप (घ) अ, ब दोनों
(183) ओज को ‘जीवशोणित’ संज्ञा किस आचार्य ने दी है।

(क) चरक (ख) चक्रपाणि (ग) भावप्रकाष (घ) डल्हण
(184) ओज को ‘शुक्र की उपधातु’ किस आचार्य ने माना है।

(क) भावमिश्र (ख) चक्रपाणि (ग) वाग्भट्ट (घ) शारंर्ग्धर
(185) ‘रसष्चौजः संख्यात’ – किस आचार्य का कथन है।

(क) चरक (ख) वाग्भट्ट (ग) भावप्रकाष (घ) डल्हण
(186) ‘गर्भरसाद्रसः’ किसके लिए कहा गया है।

(क) रस (ख) रक्त (ग) षुक्र (घ) ओज
(187) चरकानुसार गर्भस्थ ओज का वर्ण होता है।

(क) सर्पिवर्ण (ख) मधुवर्ण (ग) रक्तमीषत्सपीतकम् (घ) श्वेत वर्ण
(188) चरकानुसार हदयस्थ ओज का वर्ण होता है।

(क) सर्पिवर्ण (ख) मधुवर्ण (ग) रक्तमीषत्सपीतकम् (घ) श्वेत वर्ण
(189) ‘तन्नाशान्ना विनश्यति’ – चरक ने किसके संदर्भ में कहा गया है।

(क) रक्त (ख) ओज (ग) शुक्र (घ) प्राणायतन
(190) ‘तद् अभावाच्च शीर्यन्ेते शरीराणि शरीरिणाम्’ – उक्त कथन किसके अभाव में संदर्भित है ?

(क) रक्त (ख) ओज (ग) शुक्र (घ) मांस
(191) ओज का वर्ण ‘ष्वेत’ किसने बतलाया है।

(क) चरक (ख) चक्रपाणि (ग) डल्हण (घ) ब, स दोनों
(192) वाग्भट्टानुसार ओज का वर्ण होता है।

(क) रक्तमीषत्सपीतकम् (ख) ईषत् लोहितपीत (ग) अश्याव रक्तपीतकम् (घ) सर्पिवर्ण
(193) ओज के पर ओज एवं अपर ओज ये 2 भेद किसने बतलाए है।

(क) चरक (ख) चक्रपाणि (ग) सुश्रुत (घ) डल्हण
(194) पर ओज की मात्रा 6 बिन्दु किसने मानी है।

(क) अरूणदत्त (ख) चक्रपाणि (ग) भेल (घ) डल्हण
(195) ओज के 12 स्थानों का वर्णन किस आचार्य ने किया है।

(क) हारीत (ख) चक्रपाणि (ग) भेल (घ) डल्हण
(196) वर्णानुसार ओज के 3 भेद – 1. श्वेत वर्ण 2. तैल वर्ण 3. क्षौद्र वर्ण – किस आचार्य ने बतलाए है।

(क) चरक (ख) चक्रपाणि (ग) सुश्रुत (घ) डल्हण
(197) चरकोक्त कफ के 7 गुणों एवं ओज के 10 गुणों में से कितने गुण समान है।

(क) 7 (ख) 4 (ग) 1 (घ) कोई नहीं
(198) चरकोक्त गोदुग्ध के 10 गुणों एवं ओज के 10 गुणों में से कितने गुण समान है।

(क) 7 (ख) 4 (ग) 10 (घ) कोई नहीं
(199) चरकोक्त ओज के 10 गुणों एवं सुश्रुतोक्त ओज के 10 गुणों में से कितने गुण समान है।

(क) 7 (ख) 4 (ग) 10 (घ) कोई नहीं
(200) ओज में ‘पिच्छिल’ गुण किसने माना है।

(क) चरक (ख) सुश्रुत (ग) काष्यप (घ) अ, ब दोनों

उत्तरमाला

  1. ख 121. घ 141. ग 161. क 181. क
  2. ग 122. ग 142. घ 162. क 182. घ
  3. ग 123. ग 143. ख 163. ख 183. घ
  4. ख 124. ख 144. क 164. ग 184. घ
  5. क 125. क 145. क 165. घ 185. क
  6. क 126. ख 146. ख 166. ग 186. घ
  7. घ 127. घ 147. ख 167. ग 187. क
  8. घ 128. ख 148. ख 168. क 188. ग
  9. घ 129. ग 149. ग 169. ख 189. ख
  10. ख 130. घ 150. घ 170. ख 190. ख
  11. घ 131. घ 151. क 171. क 191. घ
  12. घ 132. ख 152. क 172. ग 192. ख
  13. घ 133. घ 153. ख 173. ख 193. ख
  14. घ 134. क 154. क 174. ख 194. क
  15. ख 135. ख 155. ग 175. ख 195. ग
  16. घ 136. क 156. क 176. घ 196. घ
  17. ख 137. क 157. क 177. ग 197. क
  18. क 138. ख 158. ख 178. क 198. ग
  19. ख 139. क 159. ग 179. ख 199. ख
  20. क 140. क 160. घ 180. ख 200. क
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