Basic Knowledge of Hindi Language Part-3

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हिंदी भाषा का बुनियादी ज्ञान भाग-3

  • रस के अंग (अवयव) है – चार, विभाव, अनुभाव, संचारी और स्थाई
  • विभाव का अर्थ है – कारण। लोक में रति आदि स्थायी भावों की उत्पति के जो कारण होते हैं उन्हें विभाव कहते है।
  • विभाव के प्रकार है – 1 आलम्बन (विषयालम्बन और आश्रयालम्बन), 2 उद्दीपन (आलम्बन की चेष्टा और प्रकृति तथा वातावरण को उद्दीप्त करने वाली वस्तु)
  • विषयालम्बन कहते हैं – उन रति आदि भावों का जो आधार है वह आश्रय है।
  • आश्रयालम्बन कहते हैं – उन रति आदि भावों का जो आधार है वह आश्रय है।
  • उद्दीपन विभाव कहते हैं – स्थाई भाव को और अधिक उद्प्रबुध्द, उद्दीप्त और उत्तेजित करने वाले कारण को कहते है।
  • अनुभाव कहते हैं – विभावों के उपरांत जो भाव उत्पन्न होते हैं उन्हें अनुभाव कहते है।
  • “”बतरस लालच लाल की, मुरली धरी लुकाई, सौंह करे, भौंहनि हंसे, दैन कहै नटि जाय”” में अनुभाव है?गोपियों की चेष्टाएं, सौंह करे, भौंहनि हंसे आदि अनुभाव है।
  • अनुभाव के प्रकार है – 1 कायिक (शारीरिक), 2 मानसिक, 3 आहार्य (बनावटी), 4 वाचिक (वाणी), 5 सात्विक (शरीर के अंग विकार)
  • सात्विक अनुभाव की संख्या है – आठ। स्तम्भ, स्वेद, रोमांच, स्वरभंग, वेपथु, वैवण्य, अश्रु, प्रलय
  • नायिका के अनुभाव माने गए है – 28 प्रकार के।
  • व्यभिचारी या संचारी भाव कहते हैं – वह भाव जो स्थायी भाव की ओर चलते है, जिससे स्थायी भाव रस का रूप धारण कर लेवे। इसे यो भी कह सकते हैं जो भाव रस के उप कारक होकर पानी के बुलबुलों और तरंगों की भांति उठते और विलिन होते है। उन्हें व्यभिचारी या संचारी भाव कहते है।
  • संचारी भाव के भेद है – भरत मुनि ने 33 संचारी भाव माने है (निर्वेद, ग्लानि, शंका, असूया, मद, श्रम, आलस्य, देन्य, चिंता, मोह, स्मृति, घृति, ब्रीडा, चपलता, हर्ष, आवेग, जड़ता, गर्व, विषाद, औत्सुक्य, निद्रा, अपस्मार, स्वप्न, विबोध, अमर्ष, अविहित्था, उग्रता, मति, व्याधि, उन्माद, मरण, वितर्क) महाकवि देव ने 34 वां संचारी भाव छल माना लेकिन वह विद्वानों को मान्य नहीं हुआ। महाराज जसवंत सिंह ने भारतभूषण में 33 संचारी भावों को गीतात्मक रूप में लिखा है।
  • स्थायी भाव का अर्थ है – जिस भाव को विरोधी या अविरोधी भाव आने में न तो छिपा सकते हैं और न दबा सकते हैं और जो रस में बराबर स्थित रहता है।
  • ‘हा राम! हा प्राण प्यारे। जीवित रहूं किसके सहारे’ में रस है – करूण रस
  • हे खग मृग हे मधुकर श्रेणी। तुम देखी सीता मृगनैनी॥ में रस है – वियोग शृंगार रस
  • स्थायी भाव की विशेषताएं है – अन्य भावों को लीन करने की, विभाव, अनुभाव, संचारी भाव से पुष्ट होकर रस में बदलता है।
  • स्थायी भाव के भेद है- प्राचीन काव्यशास्त्रियों के अनुसार नौ तथा आधुनिक के अनुसार 11
  • स्थायी भाव के भेद के नाम – रति, शोक, क्रोध, उत्साह, ह्यास, भय, विस्मय, घृणा, निर्वेद, आत्म स्नेह और ईष्ट विषयक रति।
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